भारतीय क्रिकेट के इतिहास ने एक बार फिर करवट ली है | २८ साल बाद भारत ने विश्वकप जीता है, वाकई यह गौरव की बात है | धोनी की कप्तानी और बाकि सभी खिलाडियों की लगन मेहनत, सराहनीय और अतुलनीय है |
इन ११ खिलाडियों की इस बात ने मुझे प्रभावित किया कि इनकी कर्तव्यनिष्ठा ने पूरे देश को एक कर दिखाया | ४९वे ओवर की दूसरी गेंद पर छक्का पड़ने के बाद भारत के हर शहर के लोग सड़कों पर थे और खिलाडियों के बाद अगर कोई नाम जुबान पर था तो वो था अपने देश का नाम | बड़े गर्व की बात थी की हर भारतीय के दिलो दिमाग पर सिर्फ और सिर्फ अपना देश छाया हुआ था चाहे वह क्रिकेट के ही बहाने सही |
ये तो रही एकता और विश्वास की बात, इसके आलावा भी मेने बहुत सी चीजें महसूस की उसकी कुछ बानगी बताता हूँ |
विश्वकप जीत के बाद हम शहर[लखनऊ] भ्रमण पर निकले, यार दोस्तों से मिलने के बाद जब हम वापस घर लौटने लगे तो एक मित्र बोले यार चाय पी जाए, में तपाक से बोला चाय वाले तो अपना काम कर ही रहे होंगे 'आखिर पापी पेट का सवाल है' | कुछ ही देर में मेरा भ्रम टूट गया जहाँ हम रात के दो-दो बजे तक चाय पिया करते थे वहां से भी आज चाय के ठेले नदारद थे, तब मुझे अहसास हुआ कि किसी भी जीत की ख़ुशी आपकी आत्मा को तृप्त कर देती है आखिर यह तो पूरे देश की जीत थी| लेकिन सोचने की बात यह है की कड़ी मेहनत लगन के बाद विश्वकप जीतने वाली भारतीय टीम आपको कर्तव्य परायणता सिखाती है या एक बहाना देती है प्रथमिकताए भूलने का |
पूरी धमा चौकड़ी और घुमाई करने के बाद एक मित्र ने कहा कि यार ऐसा लग रहा है कि 'जैसे देश आज आजाद हुआ हो'| इस सन्दर्भ में दो मायने हो सकते हैं.... हाँ देश आजाद हुआ है एक प्रतिस्पर्धा विशेष में मिल रही असफलता से | लेकिन क्या इस आज़ादी के मायने समझने वालों के लिए सिर्फ २८ साल का ही अंतराल है | ६२ साल से जिस आज़ादी का जश्न मना रहे हैं क्या उस आज़ादी के मायने पूरे हो पाए हैं | क्या हम उस मानसिकता से आजाद हो पाए हैं जो गोरे जाते-जाते 'बिसबेल' की तरह हमारे ऊपर छोड़ गए |
आज लगरहा था कि सड़को पर निकली भीड़ में शामिल हर व्यक्ति ने तिरंगे को अपने सीने से ऐसे लपेट रखा था जैसे की वर्षों से पराधीन किसी व्यक्ति को आज स्वाधीनता का एहसास हुआ हो |
पर इन्ही सड़कों पर १५ अगस्त २६ जनवरी को जब निकलता हूँ तो ऐसा लगता है कि मनो तिरंगा भी अपनी तन्हाई की दास्तान सुनाने को किसी की बाँट जोह रहा हो| इन दो दिनों का इंतज़ार तिरंगे के कपडे का व्यवसाय करने वालों को बेसब्री से रहता है, लेकिन झंडा फहराए जाने के बाद तिरंगा खुद ही ठगा हुआ सा प्रतीत होता है|
खैर विश्वकप जीतने की ख़ुशी में जो जश्न मना रहे थे उनमे से ज्यादातर का अगला पड़ाव जंकफूड कार्नर की तरफ था|
वहीं कुछ गरीब खुले आसमान के नीचे पथरीली जमीन पर सो रहे थे और जश्ने जीत का हुडदंग उन्हें जगा नहीं पा रहा था I क्योंकि दो जून की रोटी के लिए कल सुबह फिर उन्हें हाड़ तोड़ मेहनत करनी है I एक महोदय ऐसे भी थे जो मेरा भारत महान कहते कहते इतने जोशिया गए की क्रिकेट के मैदान में प्रतिद्वंदी टीम के देश को गरियाने लगे अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करना तो अच्छी बात है, लेकिन क्या जीत की ख़ुशी खुमारी में बदल गयी कि हम अपने नैतिक मूल्यों को भी भूल गए I
इस जीत के जश्न का गवाह एक महापुरुष भी था लोग उन्हें बापू के नाम से जानते हैं I वैसे तो यदा-कदा लोग बापू की प्रतिमा पर माला डालते नजर आते थे लेकिन आज लग रहा था की बापू किसी थीम पार्टी के गेस्ट हैं क्योंकि प्रतिमा के आस पास इकट्ठी भीड़ में से कुछ लोग शैम्पेन के स्टाइल में कोक खोल रहे थे तो कोई बेशर्मी से गाँधी की प्रतिमा के सामने सिगरेट के धुंए का छल्ला बना रहे थे I मुझे इस सन्दर्भ में गाँव में सुनी एक कहावत याद आती है 'समय बड़ा बलवान है' एक तरफ अँधेरे में गाँधी की प्रतिमा थी तो दूसरी तरफ उजाले में जगमगाती आंबेडकर की प्रतिमा भी दिख रही थी जिसकी शुरक्षा के लिए भरपूर मात्र में पुलिस तैनात थीI
वहीं कुछ गरीब खुले आसमान के नीचे पथरीली जमीन पर सो रहे थे और जश्ने जीत का हुडदंग उन्हें जगा नहीं पा रहा था I क्योंकि दो जून की रोटी के लिए कल सुबह फिर उन्हें हाड़ तोड़ मेहनत करनी है I एक महोदय ऐसे भी थे जो मेरा भारत महान कहते कहते इतने जोशिया गए की क्रिकेट के मैदान में प्रतिद्वंदी टीम के देश को गरियाने लगे अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करना तो अच्छी बात है, लेकिन क्या जीत की ख़ुशी खुमारी में बदल गयी कि हम अपने नैतिक मूल्यों को भी भूल गए I
इस जीत के जश्न का गवाह एक महापुरुष भी था लोग उन्हें बापू के नाम से जानते हैं I वैसे तो यदा-कदा लोग बापू की प्रतिमा पर माला डालते नजर आते थे लेकिन आज लग रहा था की बापू किसी थीम पार्टी के गेस्ट हैं क्योंकि प्रतिमा के आस पास इकट्ठी भीड़ में से कुछ लोग शैम्पेन के स्टाइल में कोक खोल रहे थे तो कोई बेशर्मी से गाँधी की प्रतिमा के सामने सिगरेट के धुंए का छल्ला बना रहे थे I मुझे इस सन्दर्भ में गाँव में सुनी एक कहावत याद आती है 'समय बड़ा बलवान है' एक तरफ अँधेरे में गाँधी की प्रतिमा थी तो दूसरी तरफ उजाले में जगमगाती आंबेडकर की प्रतिमा भी दिख रही थी जिसकी शुरक्षा के लिए भरपूर मात्र में पुलिस तैनात थीI
१ अरब २१ करोड़ की आबादी के इस देश में चुनिन्दा ११ खिलाडियों ने इतनी बड़ी जीत का तोहफा तो दिला दिया लेकिन उस देश की एक हालत ऐसी भी है कि विश्व की कुल २.४ प्रतिशत ज़मीन पर पूरे विश्व की १७.५ प्रतिशत आबादी को समेटे हुए है और आने वाले अगले दस सालों में तक़रीबन ३०० मिलियन लोग और इसी ज़मीन व इन्हीं संसाधनों को प्रयोग करेंगे I शायद संभव है कि इन ३०० मिलियन से हम और भी ऐसे खिलाडी निकाल पाएँगे जो इस जीत के इतिहास को दोहराते रहेंगे I
लेकिन मन में एक सवाल कोंधता है कि क्या बढती आबादी घटते प्राकृतिक संसाधन और आज़ादी के बदलते मायने कहीं एक ऐसे मोड़ पर लाके खड़ा तो नहीं कर देगा कि हम इस जश्न को मानाने के काबिल न रहें I
लेकिन मन में एक सवाल कोंधता है कि क्या बढती आबादी घटते प्राकृतिक संसाधन और आज़ादी के बदलते मायने कहीं एक ऐसे मोड़ पर लाके खड़ा तो नहीं कर देगा कि हम इस जश्न को मानाने के काबिल न रहें I