हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहाँ एक राहुल गाँधी भी रहता है, जहाँ गाँव का दीना भी रहता है, जहाँ नन्हा टिंकू और कमला भी रहते है.
राहुल गाँधी वह है जिसे गेहूं और जौ मैं फरक नहीं पता, जिसे आटा, दाल,चावल के भाव नहीं पता. जिसे पेट की भूख नहीं पता. जिसे परिवार की जिम्मेदारी नहीं पता. जिसे किसी बिटिया की शादी की चिंता नहीं खाए जा रही, जिसे किसी मां के इलाज के लिए रुपये नहीं जुटाने हैं. जिसे बारिश मैं टपकती हुई छत की मरम्मत कराने की चिंता नहीं है. जिसे खेत में सूख रही फसल पर बारिश की फुहारें पड़ने की आस नहीं है. नाहीं इसे लाला से कम दाम मिलने की बजह से बजट मेनेज करने के लिए अपने ही अनाज के बोरों की पल्लेदारी करनी पड़ती है. नहीं इसे अपने ही अनाज को बेचने के लिए सेठ जी के सामने ठिठुर कर खड़ा होना पड़ता है. नाहीं इसे खुद ही अनाज पैदा करने के बावजूद अपनी पत्नी से कहना पड़ता है कि..दो रोटी कम खा लेगी तो मर नहीं जाएगी. नाहीं इसे अपनी कमला से कहना पड़ता है कि क्या करेगी पड़कर करना तो तुझे चूल्हा-चौका ही है. नाहीं इसे अपनी बड़ी होती हुई कमला को देखके डर लगता है, नाहीं इसे कमला के हाथ पीले करने के लिए किसी साहूकार या लाला के पैरो में अपनी पगड़ी रखनी पड़ती है....
दीना वह है जो राहुल नहीं करता वह सब करता है और सोचता है कि हम बने ही इसीके लिए है. दीना वह है जिसका खुद का खेत है, खुद अनाज उगाता है, खुद मेहनत करता है लेकिन अपने खेत को बचाने के लिए, अपने अनाज का उचित दाम दिलाने के लिए किसी राहुल के आने का इंतज़ार करता है, दीना वह है जो हजारों की भीड़ के साथ चमचमाती गाड़ियों के काफिले के साथ आई प्रियंका के सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है लेकिन अपनी कमला को अपने पेरों पे खड़ा नहीं होने देता, दीना वह है जो राहुल को देखने के लिए अपना खेत खलिहान सब छोड़ कर भागता है लेकिन अपने नन्हे टिंकू के हाथ में फावड़ा थमा देता है.
यह किसी व्यक्तिविशेष या राहुल गाँधी पर प्रहार नहीं है, प्रहार उस सोच पर है जो ठीक वैसे ही है जैसे शुरुआत में डाइबिटीज और ब्लड प्रेसर जैसे मरीज इतरा कर कहते थे यह तो अमीरों और रहीशों की बीमारी है.
इसी सोच के चलते देश के तथा-कथित बुद्धिजीवी, जिम्मेदार वर्ग का तमगा लेके घूमने वाले लोग कभी भी कुछ भी बोल देते है, हालांकि यहाँ पर मैं मानता हूँ कि अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता है लेकिन, लेकिन सवाल यह उठता है की आप अपनी भावनाएं जब अभिव्यक्त कर रहे हों तो दूसरे की भावनाओं का ख़याल रखते हुए अपने विचार नहीं ज़ाहिर किये जा सकते क्या? राहुल गाँधी जी को ही लीजिए, जब बाम्बे में दहशतगर्दों ने इन्सानियत को अपनी गोली का शिकार बनाया उसके बाद इन्होंने कहा कि आतंकवाद की इस तरह की घटनाओं को एक दम नहीं रोका जा सकता. इन्हें सोचना चाहिए कि आप जिस गाँधी के नाम की मार्केटिंग कर रहे हैं या यूँ कहिये कि अब तो डायरेक्ट 'सेलिंग' कर रहे हैं उस गांधी ने भी जब अंग्रेजों से इस देश को आजाद कराने की बात कही होगी तो गोरों ने भी सोचा होगा कि हिन्दुस्तानी तो सदा ग़ुलाम ही रहेंगे, लेकिन देश आज़ाद हुआ, क्यों? क्योंकि उस गाँधी ने जवाब दिया होगा.... कि आज़ादी मिलेगी, मैं दिला के रहूँगा. यह था उसका आत्मविश्वास. कहाँ गया इस गाँधी का आत्म विश्वास जो गरीब किसानो की ज़मीन दिलवाने की बात करता है, या तो जिसे गरीबी का मतलब नहीं पता, अगर पता है तो जान बूझ कर गरीब का मजाक बनाया जा रहा है. आप उस किसान को ज़मीन दिलाने की बात कर रहे हैं, जिसके खेत मैं उगने वाला अनाज खाने वाला, किसी दूर शहर मैं पड़ने गया है, या नौकरी कर रहा है, वह कभी भी किसी दहशतगर्द की गोली का शिकार बन सकता है. हकीकत तो यह है कि आप ज़मीन की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि उसकी जमीन बिच रही है और आप की जमीन तैयार हो रही है, इसके बावजूद भी आप तथा कथित चौथे स्तम्भ की करामात की बजह से उस गरीब या पीड़ित की भूकी,नंगी,दुखी तस्वीरों को भी बेच रहे हैं.
सही कहूं तो राहुल जी को तो अपना अधिकार क्षेत्र ही नहीं पता, आप एक पार्टी के महासचिव हैं, नाकि किसी ऐसे विभाग की जिम्मेदारी है आपके ऊपर जो आपको देश की आंतरिक या बाहरी शुरक्षा से संबंधित निर्णय लेने के लिए बाध्य करती हो, फिर भी आप इसमे अपनी टांग अडाते हैं. आप गरीब, किसान के पास जा-जाकर गाँवो में धूल फांक रहे हैं, क्योंकि आप अपनी पार्टी को मजबूत करना कहते है, लेकिन आप क्यों बयान दे रहे हैं इस देश को कमजोर करने के लिए? आप जो बयान दे रहे हैं उससे संबंधित कोई अधिकार है आपके पास तो बताइए कौन सा मंत्रालय है आपके पास, कौन सा विभाग है आपके पास? हो सकता है संबंधित मंत्रालय इस सम्बन्ध मैं कोई ठोश कदम उठाने जा रहा हो, तब तक आप उसे मानसिक तौर पर कमजोर कर देते हैं. इसमे भी आपका कोई कमाल नहीं है कमाल है उस '१० जनपथ' वाले पते का और आपके नाम के पीछे लगे दो अच्छरों का.
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या दोष सिर्फ इन महाशय का ही है,क्योंकि दोषी वह है जो दीना है. क्योंकि राहुल को अपना लक्ष्य पता है, लेकिन दीना आज तक अपना लक्ष्य नहीं तय कर पाया.
इन्हें पता था कि अनपढ़ को प्रभावित करने के लिए पढ़ना चाहिए ये सात समन्दर पर से पढ़कर आये, दीना को पता था कि यह ज़मीन ही उसकी अपनी है, यह उसका पेट भर सकती है लेकिन उसने फिर भी हमेशा लाला के सामने ही हाथ फेलाए.
राहुल का गुड लक था कि वह राजीव गाँधी के यहाँ जन्मा,लेकिन दीना ने अपने बंटू को फावड़ा थमा के या लाला के यहाँ नौकरी पे लगाके उसका लक, बेड-लक मैं बदल दिया.
दीना की आँखे प्रियंका को देखके चमक उठती है, लेकिन अपनी कमला की किस्मत नहीं चमकने दी.
समझ मैं नहीं आता दीना कब बदलेगा और राहुल कब सुधरेगा.....?