Wednesday, July 20, 2011

(नोट-:जो कुछ लिख रहा हूँ उसका शीर्षक नहीं लिख पा रहा हूँ , मुझे लगता है कि इसका शीर्षक अगर लिख जाए तो देश के झंडा बरदारों की दुकान बंद हो जाएगी, मुद्दे नहीं मिलेंगे उन्हें, और अगर मुद्दे ख़तम हो जाएंगे तो अन्ना को अनशन पर बैठने का मौका नहीं मिल पाएगा, नाहीं रामदेव को लाठी खानी पड़ेगी, नाहीं मनमोहन को चुप रहने का आरोप झेलना पड़ेगा और राहुल गाँधी को दलित के घर खाना नहीं खाना पड़ेगा )

(नोट-:जो कुछ लिख रहा हूँ उसका शीर्षक नहीं लिख पा रहा हूँ , मुझे लगता है कि इसका शीर्षक अगर लिख जाए तो देश के झंडा बरदारों की दुकान बंद हो जाएगी, मुद्दे नहीं मिलेंगे उन्हें, और अगर मुद्दे ख़तम हो जाएंगे तो अन्ना को अनशन पर बैठने का मौका नहीं मिल पाएगा, नाहीं रामदेव को लाठी खानी पड़ेगी, नाहीं मनमोहन को चुप रहने का आरोप झेलना पड़ेगा और राहुल गाँधी को दलित के घर खाना नहीं खाना पड़ेगा )

हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहाँ एक राहुल गाँधी भी रहता है, जहाँ गाँव का दीना भी रहता है, जहाँ नन्हा टिंकू और कमला भी रहते है.
राहुल गाँधी वह है जिसे गेहूं और जौ मैं फरक नहीं पता, जिसे आटा, दाल,चावल के भाव नहीं पता. जिसे पेट की भूख नहीं पता. जिसे परिवार की जिम्मेदारी नहीं पता. जिसे किसी बिटिया की शादी की चिंता नहीं खाए जा रही, जिसे किसी मां के इलाज के लिए रुपये नहीं जुटाने हैं. जिसे बारिश मैं टपकती हुई छत की मरम्मत कराने की चिंता नहीं है. जिसे खेत में सूख रही फसल पर बारिश की फुहारें पड़ने की आस नहीं है. नाहीं इसे लाला से कम दाम मिलने की बजह से बजट मेनेज करने के लिए अपने ही अनाज के बोरों की पल्लेदारी करनी पड़ती है. नहीं इसे अपने ही अनाज को बेचने के लिए सेठ जी के सामने ठिठुर कर खड़ा होना पड़ता है. नाहीं इसे खुद ही अनाज पैदा करने के बावजूद अपनी पत्नी से कहना पड़ता है कि..दो रोटी कम खा लेगी तो मर नहीं जाएगी. नाहीं इसे अपनी कमला से कहना पड़ता है कि क्या करेगी पड़कर करना तो तुझे चूल्हा-चौका ही है. नाहीं इसे अपनी बड़ी होती हुई कमला  को देखके डर लगता है, नाहीं इसे कमला के हाथ पीले करने के लिए किसी साहूकार या लाला के पैरो में अपनी पगड़ी रखनी पड़ती है....

दीना वह है जो राहुल नहीं करता वह सब करता है और सोचता है कि हम बने ही इसीके लिए है. दीना वह है जिसका खुद का खेत है, खुद अनाज उगाता है, खुद मेहनत करता है लेकिन अपने खेत को बचाने के लिए, अपने अनाज का उचित दाम दिलाने के लिए किसी राहुल के आने का इंतज़ार करता है, दीना वह है जो हजारों की भीड़ के साथ चमचमाती गाड़ियों के काफिले के साथ आई प्रियंका के सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है लेकिन अपनी कमला को अपने पेरों पे खड़ा नहीं होने देता, दीना वह है जो राहुल को देखने के लिए अपना खेत खलिहान सब छोड़ कर भागता है लेकिन अपने नन्हे टिंकू के हाथ में फावड़ा थमा देता है.
यह किसी व्यक्तिविशेष या राहुल गाँधी पर प्रहार नहीं है, प्रहार उस सोच पर है जो ठीक वैसे ही है जैसे शुरुआत में डाइबिटीज और ब्लड प्रेसर जैसे मरीज इतरा कर कहते थे यह तो अमीरों और रहीशों की बीमारी है.
 इसी सोच के चलते देश के तथा-कथित बुद्धिजीवी, जिम्मेदार वर्ग का तमगा लेके घूमने वाले लोग कभी भी कुछ भी बोल देते है, हालांकि यहाँ पर मैं मानता हूँ कि अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता है लेकिन, लेकिन सवाल यह उठता है की आप अपनी भावनाएं जब अभिव्यक्त कर रहे हों तो दूसरे की भावनाओं का ख़याल रखते हुए अपने विचार नहीं ज़ाहिर किये जा सकते क्या? राहुल गाँधी जी को ही लीजिए, जब बाम्बे में दहशतगर्दों ने इन्सानियत को अपनी गोली का शिकार बनाया उसके बाद इन्होंने कहा कि आतंकवाद की इस तरह की घटनाओं को एक दम नहीं रोका जा सकता.  इन्हें सोचना चाहिए कि आप जिस गाँधी के नाम की मार्केटिंग कर रहे हैं या यूँ कहिये कि अब तो डायरेक्ट 'सेलिंग' कर रहे हैं उस गांधी ने भी जब अंग्रेजों से इस देश को आजाद कराने की बात कही होगी तो गोरों ने भी सोचा होगा कि हिन्दुस्तानी तो सदा ग़ुलाम ही रहेंगे, लेकिन देश आज़ाद हुआ, क्यों? क्योंकि उस गाँधी ने जवाब दिया होगा.... कि आज़ादी मिलेगी, मैं दिला के रहूँगा. यह था उसका आत्मविश्वास. कहाँ गया इस गाँधी का आत्म विश्वास जो गरीब किसानो की ज़मीन दिलवाने की बात करता है, या तो जिसे गरीबी का मतलब नहीं पता, अगर पता है तो जान बूझ कर गरीब का मजाक बनाया जा रहा है. आप उस किसान को ज़मीन दिलाने की बात कर रहे हैं, जिसके खेत मैं उगने वाला अनाज खाने वाला, किसी दूर शहर मैं पड़ने गया है, या नौकरी कर रहा है, वह कभी भी किसी दहशतगर्द की गोली का शिकार बन सकता है. हकीकत तो यह है कि आप ज़मीन की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि उसकी जमीन बिच रही है और आप की जमीन तैयार हो रही है,  इसके बावजूद भी आप तथा कथित चौथे स्तम्भ की करामात की बजह से उस गरीब या पीड़ित की भूकी,नंगी,दुखी तस्वीरों को भी बेच  रहे हैं.
सही कहूं तो राहुल जी को तो अपना अधिकार क्षेत्र ही नहीं पता, आप एक पार्टी के महासचिव हैं, नाकि किसी ऐसे विभाग की जिम्मेदारी है आपके ऊपर जो आपको देश की आंतरिक या बाहरी शुरक्षा से संबंधित निर्णय लेने के लिए बाध्य करती हो, फिर भी आप इसमे अपनी टांग अडाते हैं. आप गरीब, किसान के पास जा-जाकर गाँवो में धूल फांक रहे हैं, क्योंकि आप अपनी पार्टी को मजबूत करना कहते है, लेकिन आप क्यों बयान दे रहे हैं इस देश को कमजोर करने के लिए? आप जो बयान दे रहे हैं उससे संबंधित कोई अधिकार है आपके पास तो बताइए कौन सा मंत्रालय है आपके पास, कौन सा विभाग है आपके पास? हो सकता है संबंधित मंत्रालय इस सम्बन्ध मैं कोई ठोश कदम उठाने जा रहा हो, तब तक आप उसे मानसिक तौर पर कमजोर कर देते हैं. इसमे भी आपका कोई कमाल नहीं है कमाल है उस '१० जनपथ' वाले पते का और आपके नाम  के पीछे लगे दो अच्छरों का.
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या दोष सिर्फ इन महाशय का ही है,क्योंकि दोषी वह है जो दीना है. क्योंकि राहुल को अपना लक्ष्य पता है, लेकिन दीना आज  तक अपना लक्ष्य नहीं तय कर पाया.
 इन्हें पता था कि अनपढ़ को प्रभावित करने के लिए पढ़ना चाहिए ये सात समन्दर पर से पढ़कर आये, दीना को पता था कि यह ज़मीन ही उसकी अपनी है, यह उसका पेट भर सकती है लेकिन उसने फिर भी हमेशा लाला के सामने ही हाथ फेलाए.
राहुल का गुड लक था कि वह राजीव गाँधी के यहाँ जन्मा,लेकिन दीना ने अपने बंटू को फावड़ा थमा के या लाला के यहाँ नौकरी पे लगाके उसका लक, बेड-लक मैं बदल दिया.
दीना की आँखे प्रियंका को देखके चमक उठती है, लेकिन अपनी कमला की किस्मत नहीं चमकने दी.
समझ मैं नहीं आता दीना कब बदलेगा और राहुल कब सुधरेगा.....?

Tuesday, July 19, 2011

क्या वाकई में परेशान है हर कोई .......

क्या वाकई में परेशान है हर कोई   .......
जहाँ जाओ हर आदमी परेशान दिखता है, सडक पे सोने वाला जो प्रकृति की मार झेल रहा है, उससे लेके वह जो महलों में रहके प्रकृति को मार रहा है उस तक, हवाई जहाज में फर्राटे से उड़ने वाले से लेके, अपनी जिंदगी के झंझावतों से जूझता चींटी की तरह्ज रेंगने वाले तक, ज़िन्दगी में हर रोज नए तड़के के साथ आनंद लेने वाले से लेके भर पेट खाना न खाने की बजह से चिपक चुकी अंतड़ियों के साथ, भूक बुझाने के सपने के सहारे ज़िन्दगी से जूझने वाले तक ....


नोट-:  आगे और लिखना बाकी है....

Friday, April 29, 2011

इस उत्साह और जज़्बे की ज़रुरत कहीं और भी है

 

भारतीय क्रिकेट के इतिहास ने एक बार फिर करवट ली है | २८ साल बाद भारत ने विश्वकप जीता है, वाकई यह गौरव   की बात है | धोनी की कप्तानी और बाकि सभी खिलाडियों की लगन मेहनत, सराहनीय और अतुलनीय है | 
इन ११ खिलाडियों की इस बात ने मुझे प्रभावित किया कि इनकी कर्तव्यनिष्ठा ने पूरे देश को एक कर दिखाया | ४९वे ओवर की दूसरी  गेंद पर छक्का पड़ने के बाद भारत के हर शहर के लोग सड़कों पर थे और खिलाडियों के बाद अगर कोई नाम जुबान पर था तो वो था अपने देश का नाम | बड़े गर्व की बात थी की हर भारतीय के दिलो दिमाग पर सिर्फ और सिर्फ अपना देश छाया हुआ था चाहे वह क्रिकेट के ही बहाने सही |
ये तो रही एकता और विश्वास की बात, इसके आलावा भी मेने बहुत सी चीजें महसूस की उसकी कुछ बानगी  बताता हूँ |
विश्वकप जीत के बाद हम शहर[लखनऊ] भ्रमण पर निकले, यार दोस्तों से मिलने  के बाद जब हम वापस घर लौटने लगे तो एक मित्र बोले यार चाय पी  जाए, में तपाक से बोला चाय वाले तो अपना काम कर ही रहे होंगे 'आखिर  पापी पेट का सवाल है' | कुछ ही देर में मेरा भ्रम टूट गया जहाँ हम रात के दो-दो बजे तक चाय पिया करते थे वहां से भी आज चाय के ठेले नदारद थे, तब मुझे अहसास हुआ कि किसी भी जीत की ख़ुशी आपकी आत्मा को तृप्त कर देती है आखिर यह तो पूरे देश की जीत थी| लेकिन सोचने की बात यह है की कड़ी मेहनत लगन के बाद विश्वकप जीतने वाली भारतीय टीम आपको कर्तव्य परायणता सिखाती है या एक बहाना देती है प्रथमिकताए भूलने का |
पूरी धमा चौकड़ी और घुमाई करने के बाद एक मित्र ने कहा कि यार ऐसा लग रहा है कि 'जैसे देश आज आजाद हुआ हो'| इस सन्दर्भ में दो मायने हो सकते हैं.... हाँ देश आजाद हुआ है एक प्रतिस्पर्धा विशेष में मिल रही असफलता से | लेकिन क्या इस आज़ादी के मायने समझने वालों के लिए सिर्फ २८ साल का ही अंतराल है | ६२ साल से जिस आज़ादी का जश्न मना रहे हैं क्या उस आज़ादी के मायने पूरे हो पाए हैं | क्या हम उस मानसिकता से आजाद हो पाए हैं जो गोरे जाते-जाते 'बिसबेल'  की तरह हमारे ऊपर छोड़ गए |
आज लगरहा था कि सड़को पर निकली भीड़ में शामिल हर व्यक्ति ने तिरंगे को अपने सीने से ऐसे लपेट रखा था जैसे की वर्षों से पराधीन किसी व्यक्ति को आज स्वाधीनता का एहसास हुआ हो |
पर इन्ही सड़कों पर १५ अगस्त २६ जनवरी को जब निकलता हूँ तो ऐसा लगता है कि मनो तिरंगा भी अपनी तन्हाई की दास्तान सुनाने को किसी की बाँट जोह रहा हो| इन दो दिनों का इंतज़ार तिरंगे के कपडे का व्यवसाय करने वालों को बेसब्री से रहता है, लेकिन झंडा फहराए जाने के बाद तिरंगा खुद ही ठगा हुआ सा प्रतीत होता है| 
खैर विश्वकप जीतने की ख़ुशी में जो जश्न मना रहे थे उनमे से ज्यादातर का अगला पड़ाव जंकफूड कार्नर की तरफ था|
वहीं कुछ गरीब खुले आसमान के नीचे पथरीली जमीन पर सो रहे थे और जश्ने जीत का हुडदंग उन्हें जगा नहीं पा रहा था I क्योंकि दो जून की रोटी  के लिए कल सुबह फिर उन्हें हाड़ तोड़ मेहनत करनी है I एक महोदय ऐसे भी थे जो मेरा भारत महान कहते कहते इतने जोशिया गए की क्रिकेट के मैदान में प्रतिद्वंदी टीम के देश को गरियाने लगे अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करना तो अच्छी बात है, लेकिन क्या जीत की ख़ुशी खुमारी में बदल गयी कि हम अपने नैतिक मूल्यों को भी भूल गए I
इस जीत के जश्न का गवाह एक महापुरुष भी था लोग उन्हें बापू के नाम से जानते हैं I वैसे तो यदा-कदा लोग बापू की प्रतिमा पर माला डालते नजर आते थे लेकिन आज लग रहा था की बापू किसी थीम पार्टी के गेस्ट हैं क्योंकि प्रतिमा के आस पास इकट्ठी भीड़ में से कुछ लोग शैम्पेन के स्टाइल में कोक खोल रहे थे तो कोई बेशर्मी से गाँधी की प्रतिमा के सामने सिगरेट के धुंए का छल्ला बना रहे थे I मुझे इस सन्दर्भ में गाँव में सुनी एक कहावत याद आती है 'समय बड़ा बलवान है' एक तरफ अँधेरे में गाँधी की प्रतिमा थी तो दूसरी तरफ उजाले में जगमगाती आंबेडकर की प्रतिमा भी दिख रही थी जिसकी शुरक्षा के लिए भरपूर मात्र में पुलिस तैनात थीI
१ अरब २१ करोड़ की आबादी के इस देश में चुनिन्दा ११ खिलाडियों ने इतनी बड़ी जीत का तोहफा तो दिला दिया लेकिन उस देश की एक हालत ऐसी भी है कि विश्व की कुल २.४ प्रतिशत ज़मीन पर पूरे विश्व की १७.५ प्रतिशत आबादी को समेटे हुए है और आने वाले अगले दस सालों में तक़रीबन ३०० मिलियन लोग और इसी ज़मीन व इन्हीं संसाधनों को प्रयोग करेंगे I शायद संभव है कि इन ३०० मिलियन से हम और भी ऐसे खिलाडी निकाल पाएँगे जो इस जीत के इतिहास को दोहराते रहेंगे I
लेकिन मन में एक सवाल कोंधता है कि क्या बढती आबादी घटते प्राकृतिक संसाधन और आज़ादी के बदलते मायने कहीं एक ऐसे मोड़ पर लाके खड़ा तो नहीं कर देगा कि हम इस जश्न को मानाने के काबिल न रहें I